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लॉक डाउन ११ - खुल गया वाचनालय

राजेंद्र अपनी पत्नी के साथ शहर में १५ दिन पहले ही आया था, यहाँ उसे बड़ी कंपनी में सेल्स मैनेजर के पद पर नौकरी मिली है, राजेंद्र पड़ने में बहुत होशियार था उसको पड़ने का भी बहुत शौक है इसलिए उसके सामान में ३ बड़े बक्से तो किताबो के ही थे, कंपनी के तरफ से राजेंद्र को रहने के लिए एक बड़ा सा फ्लैट संपन्न सोसाइटी में दिया है, नई नई नोकरी होने से लॉक डाउन के चलते वह अपने घर नहीं जा सका, लॉक डाउन होने पर अब सोसाइटी में भी परिचय नहीं होने से उसका समय काटे नहीं कट रहा था, किताबे पड़े तो भी कितनी, सोसाइटी में करीब ५० फ्लैट थे, अब बच्चे भी अपने अपने फ्लैट से बाहर नहीं जा पा रहे थे, फ्लैट में ही बंद रहने से वो चिडचिडे होने लगे है जिससे फ्लैट में से जोर जोर से आवाजे आना शुरू हो गई है, बच्चे बाहर जाकर खेलने की जिद्द कर रहे है लेकिन उनके माता पिता उनको बाहर जाने से रोक रहे है, यह देख कर राजेंद्र को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन वो कर भी क्या सकता था? किसी से जान पहचान भी नहीं थी, आखिर उसको एक आईडिया आ ही गया, सोसाइटी में इण्टरकॉम की सुविधा थी जिससे सभी फ्लैट वाले आपस में बात कर सकते थे, राजेंद्र ने सभी फ्लैट वालो को फ़ोन लगाना शुरू किया और सबको अपना परिचय देते हुए अपने किताब पड़ने के शौक की जानकारी दी और कहा की आपके पास कोई भी किताब, कॉमिक्स, मेग्जिन या और कोई किताबे पड़ने के लिए हो तो मुझे देने का कष्ट करे, कुछ फ्लैट वालो ने राजेंद्र को सहयोग देने के लिए हामी भर दी और अपने बच्चों के साथ राजेंद्र के फ्लैट में किताबे भी भेज दी, राजेंद्र ने सभी किताबो को जमा कर एक अलमारी में रख दिया और उनकी सूची बना ली, फिर वापस सभी फ्लैट वालो को फ़ोन कर सुचना दी की कल से वो अपने फ्लैट में वाचनालय खोल रहा है जिसमे बच्चों के लिए बहुत सारी अलग अलग प्रकार की किताबे है, आप अपने बच्चों को जिनको भी किताबे पड़ने की इच्छा हो मेरे फ्लैट में सुबह ९ से १० के बीच और शाम को ६ से ७ के बीच भेज सकते है, बस सभी बच्चें मास्क लगा कर आये और एक साथ ना आये, मैं उनको घर पर पड़ने के लिए किताबे दूंगा उसका कोई चार्ज भी नहीं लगेगा, राजेंद्र की बात सुनकर सभी फ्लैट वालो को आश्चर्य हुआ की ऐसा कैसे हो गया, अब बच्चे राजेंद्र के फ्लैट पर जाते वहां पर रखी किताबो में से अपनी पसंद की किताब को चुनते और पड़ने के लिए अपने घर ले जाते, और पड़कर वापस देकर दूसरी किताब ले जाते जिससे बच्चों की चिडचिड ख़त्म हो गई थी और उनके समय एक सही काम में उपयोग हो रहा था, अब बच्चों में मम्मी पापा भी राजेंद्र के पास जाकर अपने लिए किताब लेकर आये जिससे राजेंद्र को नए शहर में एक नई पहचान मिली और वह अनजान होकर भी कुछ ही समय में सबका अपना हो गया.