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लॉक डाउन १२ - ठोकर

गुप्ताजी ऊचें पद से सेवानिवृत हुए है उनकी बहुत ऊँची पहुँच है, जिसका प्रदर्शन वो समय समय पर करते भी रहते है, अभी शर्माजी के घर काम कर चल रहा था तो घर के सामने कुछ सामान रखा था तो गुप्ताजी ने नगर निगम से गेंग को बुलवा कर उनका चालन बनवा दिया था, वो अपनी गली के लोगो को हमेशा हल्का बताने की कोशिश करते रहते है, जिससे गली के लोग उनसे किसी भी प्रकार का व्यवहार करना पसंद नहीं करते, उनके रिश्तेदार ना केवल शहर में बल्कि राजधानी में भी ऊँचे ऊँचे पदों पर आसीन है जिससे उनकी कोई सी भी समस्या हो वह तुरंत हल हो जाती, लेकिन किसी गली वाले को कोई सी भी समस्या आये तो गुप्ताजी उसके लिए सीधे सीधे मना कर देते, उनका बेटा बहु विदेश में तथा बेटी की अभी शादी करी जो मुंबई में रहती है, अब तो घर में केवल गुप्ताजी और उनकी पत्नी रहते है, उनका मानना है की उनको कुछ भी परेशानी होगी तो सभी रिश्तेदार और अधिकारी उनकी सेवा में हाजिर हो जायेंगे, महामारी के चलते लॉक डाउन चल रहा है एक दिन गुप्ताजी शाम के भोजन के बाद गली में अकेले टहल रहे थे की अचानक वो किसी से टकराए और गिर गए, जिससे उनको बहुत दर्द हो रहा था, पैर में सुजन भी आ गई जिससे लग रहा था कि उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया है, लेकिन उनको उठाने के लिए कोई तैयार नहीं था वो दर्द के मारे चिल्ला रहे थे, उनकी आवाज़ सुन कर उनकी पत्नी आई उन्होंने भी उनको उठाने की कोशिश करी लेकिन वो खड़े नहीं हो पा रहे थे, उन्होंने फ़ोन लगाकर किसी को बुलाने की कोशिश भी करी लेकिन इस समय कोई आने को तैयार नहीं था, उनकी पत्नी की आँखों से आंसू निकल आये ये देख कर पास में रहने वाले शर्मा जी आये, शर्माजी को उनकी पत्नी बच्चों ने मना किया किन्तु शर्माजी ने कहा उनकी जगह यदि में होता तो भी तुम लोग यही कहते क्या? और उन्होंने गुप्ताजी को उठाकर एक कुर्सी पर बैठाया, गुप्ताजी को दर्द बहुत हो रहा था वो कुछ बोल नहीं पा रहे थे, तभी शर्माजी ने नजदीक रहने वाले डॉक्टर साहेब को फ़ोन लगाया लेकिन वो भी उस समय उपलब्ध नहीं हो पा रहे थे गुप्ता जी के व्यवहार के कारण, शर्माजी गली के बाहर चौराहे तक गए जहा पुलिस वाले खड़े थे उन्होंने पूरी घटना की जानकारी पुलिस को दी, पुलिस ने तत्काल एम्बुलेंस के व्यवस्था करवा दी, लेकिन गुप्ताजी के साथ अस्पताल जाने के लिए कोई तैयार नहीं था, उनकी पत्नी भी कुछ समझ नहीं पा रही थी की अब क्या और कैसे करे, किसी को भी फ़ोन लगाये तो वो या तो फ़ोन उठा नहीं रहा था या लॉक डाउन का बोल कर सहायता करने में असमर्थता बता रहा था, शर्माजी ने अपने बेटे को जबरदस्ती गुप्ताजी के साथ एम्बुलेंस में बैठा कर अस्पताल पहुचाया साथ में उसको पैसे भी दिए की जरुरत पड़ने पर किसी का मुह देखने की जरुरत ना पड़े, इस पर उनके बेटे ने मना भी किया लेकिन शर्माजी ने बोले बेटा अपने को अपना पडोसी धर्म निभाना है भले ही गुप्ताजी ना निभाए, अपने को उनके जैसा नहीं बनना, गुप्ताजी को अस्पताल लेजाया जाता है जहा उनके पैर में फ्रेक्चर निकलता है, उनके पैर पर एक माह का प्लास्टर चड़ा कर उनको घर भेज दिया जाता है, घर पहुच कर वो सबसे पहले शर्माजी का शुक्रिया अदा करते है और अपने किये की माफ़ी मांगते है और कहते है कि आज मैं समझ गया की मुसीबत आती है तो सबसे पहले पडोसी ही काम आते है रिश्तेदार तो काम हो जाने के बाद आते है. अत: व्यक्ति को अपने पड़ोसियों से सम्बन्ध अच्छे रखना चाहिए.